काशीपुर |17 दिसंबर 2025
जब देश का ग्रामीण मजदूर रोजगार की गारंटी की उम्मीद लगाए बैठा है, उसी समय केंद्र की भाजपा सरकार ने मनरेगा जैसी ऐतिहासिक और अधिकार आधारित योजना की आत्मा बदलने का काम किया है। काशीपुर में महानगर कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष एवं वरिष्ठ कांग्रेस नेत्री अलका पाल ने केंद्र सरकार के इस कदम को गरीब, मजदूर और ग्रामीण भारत के साथ खुला अन्याय करार देते हुए कड़ी चेतावनी दी है।

उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी रूरल एम्प्लॉयमेंट गारंटी एक्ट (मनरेगा) का नाम बदलकर “विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)” करना केवल नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि गांधी दर्शन और ‘काम के अधिकार’ की मूल भावना को कमजोर करने की साजिश है।
अलका पाल ने कहा कि मनरेगा से न सिर्फ महात्मा गांधी का नाम हटाया गया, बल्कि इसके साथ-साथ ऐसे कई प्रावधान बदले गए हैं, जो अत्यंत चिंताजनक हैं। पहले इस योजना में केंद्र सरकार का 90 प्रतिशत और राज्य सरकार का 10 प्रतिशत अंशदान होता था और बजट का पूरा नियंत्रण केंद्र के पास था, लेकिन नई व्यवस्था में केंद्र का अंशदान घटाकर 60 प्रतिशत कर दिया गया है, जबकि 40 प्रतिशत बोझ राज्य सरकारों पर डाल दिया गया है।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि मनरेगा एक मांग आधारित और कानूनी गारंटी वाली योजना थी। यदि कोई मजदूर काम मांगता था, तो सरकार उसकी जिम्मेदारी लेकर काम और भुगतान सुनिश्चित करती थी। नई स्कीम में यह अधिकार खत्म कर दिया गया है। अब रोजगार मजदूर की मांग पर नहीं, बल्कि केंद्र द्वारा तय मानकों और बजट आवंटन पर निर्भर होगा। फंड खत्म होने का मतलब होगा—अधिकार खत्म।
महानगर अध्यक्ष अलका पाल ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने एक लीगल गारंटी स्कीम को प्रचार आधारित योजना में बदल दिया है, जिसमें खर्च राज्य सरकारें करेंगी और नियंत्रण केंद्र के हाथ में रहेगा। उन्होंने कहा कि पहले ग्राम सभाओं और पंचायतों के माध्यम से काम तय होता था, जिससे स्थानीय लोकतंत्र मजबूत होता था, लेकिन नई व्यवस्था में पंचायतों की भूमिका कमजोर कर दी गई है।
उन्होंने आगे कहा कि नई स्कीम में जीआईएस सिस्टम, बायोमेट्रिक उपस्थिति, जियो-टैगिंग, डैशबोर्ड, डिजिटल ऑडिट और पीएम गति शक्ति जैसे तकनीकी प्रावधान अनिवार्य कर दिए गए हैं। इससे वे लाखों ग्रामीण मजदूर, जो इन तकनीकों से परिचित नहीं हैं, सीधे तौर पर काम से बाहर कर दिए जाएंगे। स्थानीय जरूरतें अब केंद्र के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर स्टैक से तय होंगी, न कि गांव की प्राथमिकताओं से।
अलका पाल ने चेतावनी देते हुए कहा कि नई व्यवस्था के तहत खेती-किसानी के सीजन में दो महीने तक मजदूरों को रोजगार की कोई गारंटी नहीं दी जाएगी। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या मजदूरों को उनके भाग्य के भरोसे छोड़ दिया जाएगा? क्या उन्हें कम अनाज या शोषणकारी शर्तों पर काम करने के लिए मजबूर किया जाएगा, और सरकार मूकदर्शक बनी रहेगी?
उन्होंने कहा कि किसी योजना का नाम बदलना केवल प्रतीकात्मक बदलाव नहीं होता, बल्कि इस पर सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, जिसका सीधा बोझ आम जनता पर पड़ता है। उन्होंने सवाल किया कि क्या इस बदलाव से बेरोजगारी या महंगाई कम होगी? सच्चाई यह है कि यह परिवर्तन मनरेगा की रोजगार गारंटी की आत्मा पर सीधा हमला है।
महानगर कांग्रेस अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि धन और संसाधनों का केंद्रीकरण कर 10 प्रतिशत लोगों के विकास के नाम पर 90 प्रतिशत जनता को ‘विकसित भारत’ का सपना दिखाया जा रहा है। जब देश की जनता रोजगार की उम्मीद कर रही है, तब सरकार को प्रतीकों की राजनीति छोड़कर जमीनी सच्चाई पर काम करना चाहिए।
अंत में अलका पाल ने दो टूक कहा कि कांग्रेस पार्टी इन प्रावधानों का पुरजोर विरोध करेगी और करोड़ों गरीबों, मजदूरों और कामगारों के अधिकारों को सत्ता के हाथों छिनने नहीं देगी। उन्होंने केंद्र सरकार को चेताते हुए कहा कि यदि इन जनविरोधी बदलावों को वापस नहीं लिया गया, तो कांग्रेस सड़कों से संसद तक आवाज बुलंद करेगी।
सम्पादक काशी क्रांति हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र
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