गदरपुर।उत्तराखंड के गदरपुर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा विधायक अरविंद पांडेय को लेकर उठी सियासी आंच ने राजनीति के गलियारों में नई हलचल पैदा कर दी थी। जमीन से जुड़े विवाद से सियासत तक का यह मामला महज स्थानीय विवाद न रहकर अब प्रदेश और संगठन स्तर पर सवालों की वजह बन गया है।

गदरपुर से विधायक अरविंद पांडेय पर सरकारी भूमि पर अवैध निर्माण/अतिक्रमण का नोटिस जारी किया गया है, जिसमें प्रशासन ने उन्हें 15 दिन में अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए हैं।
साथ ही उनके परिवार के कुछ सदस्यों के खिलाफ भूमि विवाद और धोखाधड़ी से जुड़ी शिकायतें भी पंजीकृत की गई हैं, जिससे भाजपा के भीतर और बाहर सवालों की संख्या बढ़ी है।
भाजपा के भीतर उभरती कलह
अरविंद पांडेय के खिलाफ न केवल प्रशासनिक कार्रवाई बल्कि पार्टी के भीतर कुछ नेताओं की प्रतिक्रिया भी सामने आई है। पूर्व विधायक राजेश शुक्ला और रुद्रपुर के मेयर विकास शर्मा ने खुलकर पांडेय के खिलाफ मोर्चा खोला था, जिससे मामला सड़क से पार्टी संगठन के शीर्ष तक पहुंच गया।
बयान और आरोप तीखे रहे — संकेत स्पष्ट थे कि यह मुद्दा अंदरूनी जुबानों में नहीं, बल्कि खुली सियासी जंग का रूप ले सकता है।
संगठन के हस्ताक्षर और अचानक ठहराव
ऐसे में जब पार्टी के वरिष्ठ चेहरे पूर्व मंत्री व डीडीहाट विधायक बिशन सिंह चुफाल, पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, भाजपा के राष्ट्रीय मीडिया सलाहकार व पौड़ी सांसद अनिल बलूनी, और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक के पांडेय के घर आने की योजना बनी, तो माना गया कि पार्टी शीर्ष स्तर से खुद मामला सँभालने उतर रही है।
लेकिन अचानक यह कार्यक्रम रद्द हो गया, जिससे सियासी गलियारों में अटकलों का दौर तेज हो गया। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक यह संकेत है कि शीर्ष नेतृत्व ने मामला और उबाल न पकड़े इसलिए कदम पीछे लिया।
एक ओर जहां भाजपा ने नगर निकाय चुनावों में 2025 में कई जीत दर्ज की हैं — जैसे मेयर की 11 में से 10 सीटें, पंचायत नेतृत्व के 10 जिलाध्यक्ष — जो पार्टी की संगठनात्मक मजबूती को दर्शाते हैं, दूसरी ओर यह विवाद यह सवाल खड़ा करता है कि क्या सत्ता के भीतर अनुशासन, जवाबदेही और इकाईयों के बीच तालमेल वास्तव में मजबूत है?
2027 की तैयारियों पर असर
2027 के लिए विधानसभा/लोकसभा चुनावों की राह पर भाजपा के भीतर यह विवाद समय की आवश्यकता से अधिक ठहराव और अंदरुनी असंतोष का प्रतीक बन सकता है।
यदि स्थानीय नेतृत्व और पार्टी संगठन के बीच तालमेल नहीं सुधरता, तो:
मतदाताओं के बीच पारदर्शिता और जवाबदेही का मुद्दा भाजपा के लिए कमजोर बिन्दु बन सकता है।
विपक्ष असंतोष का लाभ उठाने के लिए भूमि विवाद और सत्ता दखल को चुनावी मुद्दा बना सकता है।
हालांकि भाजपा का संगठनात्मक प्रदर्शन चुनावों में अब भी मजबूत दिख रहा है, पर स्थानीय मुद्दों पर उठी लपटें अगर समय रहते शांत नहीं होतीं, तो 2027 में उनका रंग जरूर दिख सकता है।
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निष्कर्ष:
गदरपुर का ‘गदर’ फिलहाल थमा नहीं है — यह शांत खामोशी पहले की भांति लगता है, जिसमें गहराई में अभी भी सवाल हैं। भाजपा के लिए यह समय है कि वह आलोचना को सुनते हुए संगठनात्मक समन्वय और जवाबदेही पर जोर दे, ताकि 2027 के चुनावी रण में यह विवाद उसके लिए बोझ न बन जाए।
> इतिहास गवाह है कि जब जमीन और साख का सवाल उठता है, तो राजनीति की खामोशियाँ जल्दी तोड़ती हैं — भाजपा को इस बार भी यही संतुलन कायम रखना होगा।
सम्पादक काशी क्रांति हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र
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