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विशेष संवाददाता | काशीपुर/जसपुर
केंद्र और राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘जल जीवन मिशन – हर घर नल, हर घर जल’ काशीपुर और जसपुर क्षेत्र की ग्राम पंचायतों में धरातल पर दम तोड़ती नजर आ रही है। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद ग्रामीणों को शुद्ध पेयजल नसीब नहीं हो रहा। कहीं नलों से रेत-मिट्टी मिला पानी आ रहा है, तो कहीं महीनों से टंकियां सूखी पड़ी हैं।

ग्राम पंचायत करणपुर (जसपुर) और बांसखेड़ा खुर्द (काशीपुर) में हालात इतने खराब हैं कि ग्रामीणों का सब्र जवाब दे रहा है। आरोप साफ है—कागजों में योजना पूरी, जमीन पर अधूरी और घटिया।
काशीपुर–जसपुर की पंचायतों में जल जीवन मिशन सवालों के घेरे में | 6–7 करोड़ की योजनाएं फेल | ठेकेदारों को नोटिस, जिम्मेदारों की जवाबदेही तय कब?

करणपुर: 3 करोड़ 37 लाख 184 रुपए की टंकी, फिर भी गंदा पानी

करणपुर में करीब 3 करोड़ 37 लाख रुपये की लागत से पानी की टंकी, पाइपलाइन और ट्यूबवेल का निर्माण कराया गया। भुगतान भी हो चुका है।

लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि टंकी से आने वाला पानी पीने योग्य नहीं है। पानी में मिट्टी और रेत स्पष्ट दिखाई देती है। कई बार आपूर्ति पूरी तरह बंद हो जाती है।
ग्राम प्रधान हरिओम सिंह कहते हैं—
“नल तो लग गए, लेकिन पानी गंदा आ रहा है। ऐसे में जल कर कैसे लागू करें? जब पानी ही शुद्ध नहीं है तो भुगतान कैसे होगा?”
🛑 अभियंता का बयान: दो-दो नोटिस, फिर भी सुधार नहीं
करणपुर ट्यूबवेल प्रकरण पर जब सहायक अभियंता नरेंद्र कुमार रेखाड़ी (जल संस्थान, काशीपुर) से बात की गई तो उन्होंने स्वीकार किया कि ट्यूबवेल में दिक्कत आ रही है।
उनका कहना है—
- पहले भी समस्या आई थी, जिसे ठेकेदार ने ठीक किया था
- इस बार फिर गंदे पानी की शिकायत मिली
- 24 अक्टूबर 2025 को ठेकेदार को नोटिस जारी किया गया
- सुधार न होने पर 2 फरवरी 2026 को दूसरा नोटिस दिया गया
उन्होंने बताया कि करणपुर का ट्यूबवेल “रिवॉर” (पुनर्स्थापित/रीबोर) किया जाएगा और इसके लिए ठेकेदार को निर्देशित किया गया है। उन्होंने बताया कि करणपुर में पानी की टंकी के निर्माण लाइन पाइप लाइन बिछाने तथा ट्यूबवेल करने और निर्माण कार्य आदि सभी कार्य में लगभग एक करोड रुपए खर्च हुआ है। एक करोड रुपए की ही कार्य योजना थी जबकि टंकी के पास लगे बोर्ड पर कीमत कुछ अलग ही दर्शी गई है।
सवाल यह है कि —
जब दो बार नोटिस देना पड़ा, तो क्या गुणवत्ता जांच और निगरानी समय पर हुई थी?
और यदि भुगतान पहले ही हो चुका था, तो जवाबदेही किसकी?
बांसखेड़ा खुर्द: 460.58 करोड़ , फिर भी हैंडपंप सहारा

बांसखेड़ा खुर्द में जल जीवन मिशन से लगभग 7 करोड़ 49 लाख रुपये स्वीकृत हुए थे। कार्य करने में 4 करोड़ 58 लख रुपए कार्य योजना में खर्च हुए जिसमें ट्यूबवेल पर ही करीब 52 लाख रुपये व्यय हुए।
इसके बावजूद ग्रामीणों का आरोप है कि—
- नलों में पीला और रेत मिला पानी आता है
- तीन महीने से टंकी में पानी नहीं आया
- कई घरों में नल तो लगे हैं, लेकिन टोटियां तक नहीं

ग्रामीण मोहम्मद यामीन कहते हैं—
“तीन महीने से टंकी सूखी है। नल में गंदा पानी आता है। मजबूरी में हैंडपंप का सहारा लेना पड़ रहा है।”
श्रीमती कमलेश का कहना है—
“शिकायतें कीं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।”
🏛 पेयजल निगम की चुप्पी, प्रशासन हरकत में?
दोनों मामलों में पेयजल निगम की ओर से कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला।
जब इस संबंध में उप जिला अधिकारी अभय प्रताप सिंह से फोन पर जानकारी ली गई तो उन्होंने कहा कि मामला उनकी जानकारी में नहीं था, वे जानकारी लेकर बताएंगे।
बाद में जब उन्होंने जल संस्थान और पेयजल निगम के अधिकारियों से फोन पर बात की, तो उन्हें अलग-अलग जानकारी दी गई।
उप जिला अधिकारी ने स्पष्ट कहा—
“14 फरवरी को मैं दोनों ग्राम पंचायतों का स्थलीय निरीक्षण करूंगा। यदि जल निगम या पेयजल निगम के अधिकारियों की लापरवाही पाई गई तो विभागीय कार्रवाई की जाएगी। ग्रामीणों की समस्या का समाधान कराया जाएगा।”

बड़े सवाल, जिनका जवाब बाकी
- क्या गुणवत्ता परीक्षण नियमानुसार हुआ?
- भुगतान से पहले स्थलीय सत्यापन क्यों नहीं हुआ?
- दो साल बाद भी व्यवस्था दुरुस्त क्यों नहीं?
- नोटिस देने के बाद भी ठेकेदार पर कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं?
यदि करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी ग्रामीणों को गंदा पानी मिल रहा है, तो यह केवल तकनीकी खामी नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का गंभीर प्रश्न है।
⚠ स्वास्थ्य पर खतरा
गंदे और रेत मिश्रित पानी के लगातार सेवन से जलजनित रोगों का खतरा बढ़ सकता है। यदि समय रहते सुधार नहीं हुआ, तो यह सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले सकता है।
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निष्कर्ष: जवाबदेही तय होगी या फिर कागजी कार्रवाई?
‘हर घर नल, हर घर जल’ का सपना यदि जमीनी स्तर पर गंदे पानी और सूखी टंकियों में बदल जाए, तो यह केवल योजना की विफलता नहीं, बल्कि जनता के विश्वास के साथ खिलवाड़ है।
14 फरवरी को प्रस्तावित निरीक्षण के बाद क्या वाकई जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी, या फिर मामला नोटिसों और फाइलों में ही दब जाएगा — यह देखने वाली बात होगी।
अब सवाल केवल विभागीय लापरवाही का नहीं, बल्कि राजनीतिक जवाबदेही का भी है।
राज्य सरकार और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों को भी अपने-अपने क्षेत्रों में इस गंभीर मुद्दे पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। उत्तराखंड जल संस्थान और पेयजल निगम की कार्यप्रणाली यदि ऐसी ही रही, तो सरकार के ‘हर घर नल, हर घर जल’ के सपनों पर ही पानी फिरता नजर आएगा — और जनता के बीच यह संदेश जाएगा कि सरकार खामोश है, जबकि ग्रामीण गंदा पानी पीने को मजबूर हैं।
ग्रामीणों की मांग साफ है —
कागजों में नहीं, जमीनी हकीकत में ‘हर घर जल’ चाहिए।
सम्पादक काशी क्रांति हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र
कार्यालय – इस्लामनगर बसई, थाना कुंडा, काशीपुर, उधम सिंह नगर, उत्तराखण्ड
संपर्क – 99279 76675
